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महामृत्युंजय का अर्थ

 महामृत्युंजय का वास्तविक अर्थ- मृत्यु के पूर्व महामृत्यु को जानना अति आवश्यक है। मृत्यु का अर्थ है शरीर का छूटना या शरीर का त्याग। इस संसार में अविनाशी आत्मा और परमात्मा के अलावा सब विनाशी है अर्थात सभी की मृत्यु निश्चित है। मृत्यु और महामृत्यु में क्या अन्तर है।  इस गहरे और गूढ़ रहस्य को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समझने पर इसका अर्थ अत्यंत ही महत्वपूर्ण हो जाता है। मृत्यु शरीर की है फिर महामृत्यु किसकी है। जैसे काल और महाकाल। मृत्यु का सम्बंध काल से है तो महामृत्यु का सम्बंध महाकाल से है। श्रीमद्भगवद्गीता के 15वें अध्याय में भगवान कहते हैं कि मन सहित छह इंद्रियों आंख,कान,नाक,जिव्हा, और त्वचा के द्वारा ये शरीर भोग करता है और इन्ही के द्वारा पाप और पुण्य के आधार पर उसके संस्कार एक जन्म से दूसरे जन्म में वायु मार्ग द्वारा आत्मा में प्रविष्ट होकर मनुष्य को सुख और दुःख का अनुभव कराते हैं। इसी को ही अनुवांशिक सिद्धान्त कहा जाता है।  शैव सिद्धान्त के अनुसार यदि शरीर का सम्बन्ध मृत्यु(काल) से है तो उपरोक्त छह इंद्रियों का सम्बन्ध महामृत्यु (महाकाल) से है। श्रीमद्भगवद्गीता के बारहवे...

बिल्वपत्र (शिव तत्व रहस्य)

 🧚शिव तत्व रहस्य🧚 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ ॐ परमात्मने नमः परम् आनन्द और सौभाग्य प्राप्ति के लिए ईश्वरीय रहस्य को जानना अति आवश्यक है।   भगवान शिव को बिल्वपत्र अधिक क्यों प्रिय है तथा इसका आध्यात्मिक महत्व क्या है? 🕉️ आइये आज हम इस रहस्य को भी जानते हैं। 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ स्कन्द पुराण के अनुसार मंदराचल पर्वत पर माँ पार्वती के पसीने की एक बूंद गिरने से बिल्वपत्र का व्रक्ष उतपन्न हुआ इसमे माता पार्वती का सूक्ष्म शरीर  प्रवेश कर गया जिस कारण से बिल्वपत्र को माता पार्वती का अंश माना जाने लगा। भगवान शिव को पाने के लिए माता पार्वती ने उसी बिल्वपत्र के नीचे बैठकर कठिन तपस्या करी और भगवान शिव को प्राप्त कर लिया। इस व्रक्ष पर माता लक्ष्मी का भी वास माना जाता है। परमात्मा की अनुभूति दो रूपों में है साकार और निराकार अर्थात सगुण और निर्गुण । माता पार्वती ने भगवान के दोनों रूपों को एकाकार किया है।भगवान शिव ने भी माता पार्वती की सूक्ष्म गहराई में प्रवेश कर उन्हें साकार और निराकार दोनो रूप में स्वीकार किया। यही भगवान का अर्धनारीश्वर स्वरूप है। जो इस बात का गहरा सन्देश देता है कि स...

शिव तत्व रहस्य(गंगा जी और ब्रह्मरन्ध्र)

 शिव तत्व रहस्य आप सभी शिव भक्तों को श्रावण मास की हार्दिक शुभकामनाएं । आज पुनः हम अपनी सूक्ष्म बुद्धि और परमात्मा की कृपा से शिव तत्व के एक अन्य रहस्य पर प्रकाश डालेंगे। शिव पुराण में कहा गया है शिवजी की जटाओं में जो गंगा जी स्थापित हैं वो स्थान वास्तव में भगवान शिव के सिर का मध्य स्थान है । सिर का मध्य स्थान सहस्रार चक्र या ब्रह्मरंध कहलाता है।  कभी आपने देखा होगा कि शिशु के सिर का मध्य भाग अत्यंत कोमल होता है और उसमें गड्ढा भी पड़ने लगता है इसका अर्थ है वो स्थान इसलिए कोमल है कि उसमें ब्रह्म की असीम शक्ति स्थित है इसी कारण वो ब्रह्मरन्ध्र है। इसे ब्रह्म का छिद्र या ब्रह्म का मार्ग भी कहा जाता है। जैसे जैसे वो शिशु बड़ा होता है वैसे वैसे माया के वशीभूत होकर संसार मे लिप्त होता जाता है जिससे सिर के मध्य स्थान की कोमलता कठोरता में बदल जाती है और ब्रह्म मार्ग बंद हो जाता है।  परम् पिता परमेश्वर भगवान शंकर ने अपने उसी ब्रह्मरन्ध्र पर माँ गंगा को स्थापित कर सम्पूर्ण जगत को ये संदेश दिया है कि यदि मनुष्य अपने अंदर गंगा के समान पवित्रता ,शुद्धि और मोक्ष की भावना रखता है तो उसका ...

शिव तत्व का रहस्य( अघोरी की व्याख्या)

 🧚शिव तत्व रहस्य🧚 🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️🕉️ भगवान शिव के लिए एक शब्द प्रयोग हुआ है "अघोर" सामान्य रूप से अघोर का अर्थ श्मशान में रहने वाला,तांत्रिक,भयानक, कठिन आदि माना जाता है। भगवान को इसीलिए अघोरी कहा जाता है और अघोरी रूप मस्तिष्क में आते ही भगवान का विकराल रूप सामने आ जाता है जबकि अघोर शब्द की ये धारणा पूर्णतः गलत और निरर्थक है। जबकि अघोर का शाब्दिक अर्थ है जो घोर अर्थात भयंकरता से अलग होकर सहज और सरल हो। जो घोर से भी घोर पापों से मुक्त हो।जिसने अपनी इद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली हो तथा जो हर स्थिति में शान्त हो वो अघोर है। भगवान शिव का अघोर रूप पंच आध्यात्मिक अवतारों में शिव कल्प में लिया हुआ चतुर्थ आध्यात्मिक अवतार है जिसका रंग घने काले बादलों के समान काला है और जिसकी दिशा दक्षिण है। भगवान के पंचमुखी शिवलिंग जो पशुपति नाथ के नाम से जाना जाता है उसमे दक्षिण दिशा का मुख अघोर अवतार का है जो पूर्णतः सहज,सरल और ज्ञान से परिपूर्ण है जिसके द्वारा  भगवान ने समस्त सृष्टि कोअथर्वेद का ज्ञान दिया है।  ये शुद्ध आध्यात्मिक ज्ञान भगवान के अघोर अवतार के द्वारा ही प्राप्त हुआ है।...

सूतक में पूजा क्यों नही की जाती

  सूतक में पूजा क्यों नही की जाती है ? ज्यो तिष शास्त्र के अनुसार बृहस्पति ग्रह पूजा पाठ के प्रबल कारक हैं साथ ही बृहस्पति का बड़ा गुण है किसी भी चीज को बढ़ाना। यदि सूतक के समय पूजा पाठ की जाती है तो ब्रहस्पति ग्रह जाग्रत हो जाते हैं और सूतक को बढ़ाने का कार्य करते हैं जबकि सूतक के समय राहु प्रबल रहते हैं ।यदि सूतक के समय पूजा पाठ की जाती है तो ब्रहस्पति भी activate होकर राहु के साथ गुरु चांडाल दोष बनाते हैं जिसके बुरे परिणाम आने लग जाते हैं।  इसी कारण सूतक के समय पूजा -पाठ निषेध बतलाया गया है। सूतक के समय केवल मानसिक पूजन करना चाहिए। ध्यान आदि करना अधिक लाभकारी रहता है। 🙏🙏🙏🙏🙏🙏  *सत्य सनातन संस्कार एवं शिक्षा संस्थान ,कानपुर*  आचार्य (डॉ)राहुल अस्थाना

उपाय फलित होने का समय ,40 दिन में मिलता है उपाय का फल

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  किसी भी उपाय का परिणाम आने में 40 दिन (सवा) महीने का  समय क्यों लगता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चन्द्रमा  ही ज्योतिष का मुख्य आधार ग्रह है जिस समय से उपाय आरम्भ किया जाता है उस समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र (point) पर होते हैं वहाँ से 360 अंश का वृत्त पूर्ण करने में 28 नक्षत्र ( अभिजीत सहित) तथा 12 राशियों का पथ भी  पूर्ण करते हैं। चन्द्रमा को इस पथ को पूर्ण करने में कुल 30 दिन का समय लगता है।जैसे ही चन्द्रमा अपनी उपाय यात्रा आरम्भ करता है जातक के प्रारब्ध का दोष हटना आरम्भ हो जाता है। कोई भी कर्म  5 कर्मेन्द्रियों और 5 ज्ञानेन्द्रियों के बिना असम्भव है अतः इन्हें भी प्रारब्ध का दोष लगता है जिसके कारण व्यक्ति अनेक समस्याओं से ग्रसित रहता है । उपाय करते समय जातक अपनी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को प्रयोग में लाता है जिससे वो अपने पूर्वजन्म के प्रारब्ध से मुक्त होता जाता है और उसे उपाय का लाभ मिलता है। 30 दिनों में 5 कर्मेन्द्रियों और 5 ज्ञानेन्द्रियों को भी जोड़ा जाता है इस प्रकार 40 दिन बनते हैं।  *ज्योतिषीय सलाह*  किसी भी उपाय को करते या करवाते स...