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Showing posts from June, 2023

सूतक में पूजा क्यों नही की जाती

  सूतक में पूजा क्यों नही की जाती है ? ज्यो तिष शास्त्र के अनुसार बृहस्पति ग्रह पूजा पाठ के प्रबल कारक हैं साथ ही बृहस्पति का बड़ा गुण है किसी भी चीज को बढ़ाना। यदि सूतक के समय पूजा पाठ की जाती है तो ब्रहस्पति ग्रह जाग्रत हो जाते हैं और सूतक को बढ़ाने का कार्य करते हैं जबकि सूतक के समय राहु प्रबल रहते हैं ।यदि सूतक के समय पूजा पाठ की जाती है तो ब्रहस्पति भी activate होकर राहु के साथ गुरु चांडाल दोष बनाते हैं जिसके बुरे परिणाम आने लग जाते हैं।  इसी कारण सूतक के समय पूजा -पाठ निषेध बतलाया गया है। सूतक के समय केवल मानसिक पूजन करना चाहिए। ध्यान आदि करना अधिक लाभकारी रहता है। 🙏🙏🙏🙏🙏🙏  *सत्य सनातन संस्कार एवं शिक्षा संस्थान ,कानपुर*  आचार्य (डॉ)राहुल अस्थाना

उपाय फलित होने का समय ,40 दिन में मिलता है उपाय का फल

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  किसी भी उपाय का परिणाम आने में 40 दिन (सवा) महीने का  समय क्यों लगता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चन्द्रमा  ही ज्योतिष का मुख्य आधार ग्रह है जिस समय से उपाय आरम्भ किया जाता है उस समय चन्द्रमा जिस नक्षत्र (point) पर होते हैं वहाँ से 360 अंश का वृत्त पूर्ण करने में 28 नक्षत्र ( अभिजीत सहित) तथा 12 राशियों का पथ भी  पूर्ण करते हैं। चन्द्रमा को इस पथ को पूर्ण करने में कुल 30 दिन का समय लगता है।जैसे ही चन्द्रमा अपनी उपाय यात्रा आरम्भ करता है जातक के प्रारब्ध का दोष हटना आरम्भ हो जाता है। कोई भी कर्म  5 कर्मेन्द्रियों और 5 ज्ञानेन्द्रियों के बिना असम्भव है अतः इन्हें भी प्रारब्ध का दोष लगता है जिसके कारण व्यक्ति अनेक समस्याओं से ग्रसित रहता है । उपाय करते समय जातक अपनी कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों को प्रयोग में लाता है जिससे वो अपने पूर्वजन्म के प्रारब्ध से मुक्त होता जाता है और उसे उपाय का लाभ मिलता है। 30 दिनों में 5 कर्मेन्द्रियों और 5 ज्ञानेन्द्रियों को भी जोड़ा जाता है इस प्रकार 40 दिन बनते हैं।  *ज्योतिषीय सलाह*  किसी भी उपाय को करते या करवाते स...

ज्योतिष शास्त्र और हमारे पितृ देव,पितृ दोष निवारण

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 *हमारे पितृदेव और ज्योतिष*  ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चतुर्थ और दशम भाव क्रमशः हमारे माता -पिता का होता है।माता के कर्म चतुर्थ से दशम भाव अर्थात प्रथम भाव और पिता के कर्मों का लेखा जोखा दशम से दशम भाव सप्तम भाव मे होता है। ठीक इसी प्रकार चतुर्थ ,सप्तम और दशम भाव से क्रमशः माता,मातामह और प्रमातामह का विचार होता है तथा दशम,सप्तम और चतुर्थ भाव से पिता,पितामह और प्रपितामह का विचार होता है। इस प्रकार पूरा का पूरा केंद्र 1,4,7 व 10 भाव का सम्बंध हमारे पूर्वजों या पितरों से हो जाता है।अन्य शब्दों में कहें तो माता तथा पिता दोनो पक्ष की तीन पीढियां एवं उनके कर्म  कुंडली के केंद्र भावों में ही स्थित हैं। अब विचार करते हैं कि कुंडली के  केंद्र भावों से क्या विचार किया जाता है।  *प्रथम भाव*- शरीर,स्वास्थ्य,यश व्यक्तित्त्व ,आदि  *चतुर्थ भाव*  मकान,वाहन,समस्त भौतिक सुख  *सप्तम भाव*  जीवन साथी तथा दाम्पत्य सुख  *दशम भाव*  कर्मक्षेत्र,(नौकरी,व्यवसाय) आदि इस प्रकार ये कहना बिल्कुल उचित होगा कि पूर्वजों की कृपा से ही उपरोक्त भावों के फल प्राप्त...

अतिथि देवो भव

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 " *अतिथि देवो भव " का वेदों के अनुसार महत्व* वैदिक ग्रन्थों के अनुसार सर्वप्रथम  नाद के रूप में ॐ की उत्पत्ति हुई जिसे ब्रह्म कहा गया और ॐ को परमात्मा का वैदिक नाम भी माना गया । इसके उपरान्त श्रुति रूप में  ऋचाओं का ज्ञान आया जो ऋग्वेद में समाहित है। प्रत्येक ऋचा प्रार्थना और परमात्मा की प्रशंसा के रूप में है। प्रशंसा का अर्थ है देवता को प्रसन्न करना । वेद कहते हैं कि जब भी हमारे घर मे कोई मेहमान आता है तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं और प्रसन्न होते हैं। ये प्रसंसा वास्तव में वेद की ऋचाएँ ही हैं। इस प्रकार आने वाला मेहमान देव तुल्य होता है। और हम स्वयं यजमान बन जाते हैं । उस मेहमान को परोसा जाना वाला अन्न और जल यज्ञ की आहुतियों के समान होती हैं जिसे देव तुल्य मेहमान ग्रहण करता है।अतिथि के जाने के उपरान्त उसके बारे में चिन्तन करके आनन्द लेना ही इस यज्ञ की फलश्रुति है। ध्यान रखिये की कभी भी अतिथि के जाने के बाद उसकी बुराई नही करनी चाहिए और न ही उसकी कमियों का चिन्तन करना चाहिए अन्यथा किये सत्कार रूपी यज्ञ का फल नकारात्मकता में बदल जाता है। इसीलिए कहा गया है- " *अतिथि देवो भव...