ज्योतिष शास्त्र और हमारे पितृ देव,पितृ दोष निवारण
*हमारे पितृदेव और ज्योतिष*
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चतुर्थ और दशम भाव क्रमशः हमारे माता -पिता का होता है।माता के कर्म चतुर्थ से दशम भाव अर्थात प्रथम भाव और पिता के कर्मों का लेखा जोखा दशम से दशम भाव सप्तम भाव मे होता है।
ठीक इसी प्रकार चतुर्थ ,सप्तम और दशम भाव से क्रमशः माता,मातामह और प्रमातामह का विचार होता है तथा दशम,सप्तम और चतुर्थ भाव से पिता,पितामह और प्रपितामह का विचार होता है।
इस प्रकार पूरा का पूरा केंद्र 1,4,7 व 10 भाव का सम्बंध हमारे पूर्वजों या पितरों से हो जाता है।अन्य शब्दों में कहें तो माता तथा पिता दोनो पक्ष की तीन पीढियां एवं उनके कर्म कुंडली के केंद्र भावों में ही स्थित हैं। अब विचार करते हैं कि कुंडली के केंद्र भावों से क्या विचार किया जाता है।
*प्रथम भाव*- शरीर,स्वास्थ्य,यश व्यक्तित्त्व ,आदि
*चतुर्थ भाव*
मकान,वाहन,समस्त भौतिक सुख
*सप्तम भाव*
जीवन साथी तथा दाम्पत्य सुख
*दशम भाव*
कर्मक्षेत्र,(नौकरी,व्यवसाय) आदि
इस प्रकार ये कहना बिल्कुल उचित होगा कि पूर्वजों की कृपा से ही उपरोक्त भावों के फल प्राप्त हो सकते हैं। ईश्वर को तो प्रसन्न कर लिया परन्तु माता -पिता सहित हमारे पितृदेव यदि प्रसन्न नही हैं तो निश्चित ही उपरोक्त फल प्राप्त नही होंगे।
अब निम्न बातों पर विचार करें -
जिस घर मे पूर्वजों की मुक्ति के निमित्त कुछ कर्म किया जाता रहता है उस घर मे सुख समृद्धि बनी रहती है।
जिस घर मे माता -पिता का सम्मान होता है उस घर मे पूर्वजों की कृपा मिलती रहती है।
( एक कटु सत्य है कि यदि घर मे किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अतृप्त रूप से हो जाती है तो उसकी आत्मा से अतृप्त ऊर्जा ही संचरित होगी जो घर मे दुःख, रोग कलह आदि का कारण बनेगी ।इससे उतपन्न रस ही उस आत्मा का भोजन होगा जो धीरे धीरे पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता जाता है और तीसरी पीढ़ी के उपरांत विकलांगता का रूप ले लेता है)
अतः केंद्र भावों का सुख प्राप्त करने के लिए पूर्वजों के निमित्त कुछ साधन अवश्य करते रहें।
*सौजन्य से*
आचार्य (डॉ) राहुल अस्थाना
ज्योतिषाचार्य
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