अतिथि देवो भव
" *अतिथि देवो भव " का वेदों के अनुसार महत्व*
वैदिक ग्रन्थों के अनुसार सर्वप्रथम नाद के रूप में ॐ की उत्पत्ति हुई जिसे ब्रह्म कहा गया और ॐ को परमात्मा का वैदिक नाम भी माना गया । इसके उपरान्त श्रुति रूप में ऋचाओं का ज्ञान आया जो ऋग्वेद में समाहित है। प्रत्येक ऋचा प्रार्थना और परमात्मा की प्रशंसा के रूप में है। प्रशंसा का अर्थ है देवता को प्रसन्न करना ।
वेद कहते हैं कि जब भी हमारे घर मे कोई मेहमान आता है तो हम उसकी प्रशंसा करते हैं और प्रसन्न होते हैं। ये प्रसंसा वास्तव में वेद की ऋचाएँ ही हैं। इस प्रकार आने वाला मेहमान देव तुल्य होता है। और हम स्वयं यजमान बन जाते हैं । उस मेहमान को परोसा जाना वाला अन्न और जल यज्ञ की आहुतियों के समान होती हैं जिसे देव तुल्य मेहमान ग्रहण करता है।अतिथि के जाने के उपरान्त उसके बारे में चिन्तन करके आनन्द लेना ही इस यज्ञ की फलश्रुति है।
ध्यान रखिये की कभी भी अतिथि के जाने के बाद उसकी बुराई नही करनी चाहिए और न ही उसकी कमियों का चिन्तन करना चाहिए अन्यथा किये सत्कार रूपी यज्ञ का फल नकारात्मकता में बदल जाता है। इसीलिए कहा गया है- " *अतिथि देवो भव"*
आचार्य (डॉ)राहुल अस्थाना
ज्योतिष मर्मज्ञ
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
🙏🙏🙏🙏
ReplyDelete